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About ICMR

पृष्ठिभूमि

परिषद की शोध प्राथमिकताएं राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राथमिकताओं के अनुरुप हैं जैसे कि संचारी रोगों पर नियंत्रण और प्रबंधन, प्रजनन क्षमता नियंत्रण, स्वास्थ्य सुरक्षा वितरण हेतु वैकल्पिक नीतियों का विकास, पर्यावरणी एवं व्यावसायिक स्वास्थ्य समस्याओं की सुरक्षा सीमाओं में रोकथाम, कैंसर ह्दवाहिकीय रोगों, अंधता, मधुमेह तथा चयापचयज एवं रुधिर विकारों जैसे प्रमुख असंचारी रोगों पर अनुसंधान, मानसिक स्वास्थ्य अनुसंधान और औषधि अनुसंधान (पारम्परिक औषधियों सहित)। ये सारे प्रयास रोग के पूर्ण भार को घटाने और आबादी के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण को बढ़ावा देने को ध्यान में रखते हुए किए जा रहे है।
    केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री परिषद के शासी निकाय के अध्यक्ष हैं। जैवआयुर्विज्ञान के विभिन्न विषयों के प्रतिष्ठित विशेषज्ञों की सदस्यता में बने एक वैज्ञानिक सलाहकार बोर्ड द्वारा इसके वैज्ञानिक एवं तकनीकी मामलों में सहायता प्रदान की जाती है। इस बोर्ड को वैज्ञानिक सलाहकार दलों, वैज्ञानिक सलाहकार समितियों, विशेषज्ञ दलों, टास्क फोर्स, संचालन समितियों आदि द्वारा सहायता प्रदान की जाती है, जो परिषद की विभिन्न शोध गतिविधियों का मूल्यांकन करती है और उन पर निगरानी रखती है। (चार्ट)
    परिषद इंट्राम्युरल और एक्स्ट्राम्यूरल अनुसंधान के सामाध्य से देश में जैव आयुर्विज्ञान शोध को बढ़ावा देती है। वर्षों से, एक्स्ट्राम्यूरल अनुसंधान का आधार और उसकी नीतियों का परिषद द्वारा विस्तार किया गया है।

इंट्राम्यूरल अनुसंधान

    वर्तमान में परिषद के 32 अनुसंधान संस्थानों/ केन्द्रों/ एककों के माध्यम से इंट्राम्यूरल अनुसंधान किया जाता है। इसमें निम्न अनुसंधान शामिल हैः-
1. देश के विभिन्न भागों में स्थित प्रसिद्ध राष्ट्रीय संस्थानों में विशिष्ट क्षेत्रों यथा- एड्स, मलेरिया, कालाजार, वेक्टर नियंत्रण, पोषण, प्रजनन, प्रतिरक्षा रुधिरविज्ञान , कैंसर, चिकित्सा सांख्यिकी आदि सहित तपेदिक, कुष्ठरोग, हैज़ा त…था डायरिया रोग, वायरल रोगों पर अनुसंधान को समर्पित 21 मिशन हैं।
2. 6 क्ष्रेत्रीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान केन्द्र-क्षेत्रीय स्वास्थ्य समस्याओं के लिए समर्पित हैं तथा उनका उद्देश्य देश के विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में अनुसंधान को सुदृढ़ करना और अनुसंधान क्षमताएं उत्पन्न करना हैं।
3.  5 एकक/ केन्द्र खाद्य एवं औषधि विषाक्तता, विषाणु रोगों, अत्यंत संक्रामण प्रकृति के सूक्ष्मजीवों के रख-रखाव, नवजात मन्दता हेतु प्रसवपूर्व निदान आदि पर अनुसंधान तथा प्रायोगिक उद्देश्य से विभिन्न जंतु मॉडेलों और उनके आहार की आपूर्ति से संबद्ध है।

एक्स्ट्राम्यूरल अनुसंधान

भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद  निम्न के माध्यम से एक्स्ट्राम्यूरल अनुसंधान को प्रोत्साहित  करता हैः-

1. मेडिकल कॉलेजों, विश्वविद्यालयों तथा अन्य गैर आईसीएमआर अनुसंधान संस्थानों के चयनित किये गये विभागों में मौजूद विशेषज्ञता और बुनियादी ढ़ांचे के आसपास विभिन्न अनुसंधान क्षेत्रों में उन्नत अनुसंधान के लिए केन्द्रों की स्थापना करना।
2.  टास्क फोर्स अध्ययन जिसमें स्पष्ट रुप से परिभाषित लक्ष्यों, विशिष्ट समय सीमा, मानकीकृत एवं समान विधियों और बहुधा एक बहुकेन्द्रित संरचना के सा…थ एक समयबद्ध, लक्ष्योन्मुख प्रयास को बल दिया जाता है।
3.  देश के विभिन्न भागों में स्थित गैर आईसीएमआर संस्थानों, मेडिकल कॉलेजों, विश्वविद्यालयों आदि के वैज्ञानिकों से सहायतार्थ अनुदान के लिए आवेदन प्राप्त करने के आधार पर ओपन एंडेड अनुसंधान।

अध्येतावृत्ति

         इन अनुसंधान गतिविधियों के अलावा, आईसीएमआर जैव चिकित्सा अनुसंधान में निम्न के माध्यम से मानव संसाधन विकास को भी प्रोत्साहित करता हैः
1.       अनुसंधान अध्येतावृत्तियां
2.       अल्पकालिक दौरा (विज़िटिंग) अध्येतावृत्तियां
3.       अल्पकालिक अनुसंधान छात्रवृत्तियां
4.       आईसीएमआर के संस्थानों और मुख्यालय द्वारा विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रमों और कार्यशालाओं का आयोजन।

इमेरिटस (सेवानिवृत्त) वैज्ञानिक योजना

      सेवानिवृत्त चिकित्सा वैज्ञानिकों और शिक्षकों के लिए परिषद विशिष्ट जैवचिकित्सा विषयों पर अनुसंधान को जारी रखने अथवा अनुसंधान करने के लिए उन्हें इमेरिटस वैज्ञानिकों के रूप में सक्षम बनाने का अवसर प्रदान करता है। परिषद, भारतीय वैज्ञानिकों को जैव चिकित्सा अनुसंधान में महत्वपूर्ण योगदान की मान्यता के रूप में पुरस्कार भी प्रदान करता है। वर्तमान में, परिष्द 38 पुरस्कार प्रदान करता है जिनमें से 11 पुरस्कार विशेष रूप से युवा वैज्ञानिकों (40 वर्ष से कम आयु) के लिए हैं।

      जन स्वास्थ्य के बदलते परिवेश के संदर्भ में, विभिन्न प्रतिस्पधाओं के क्षेत्रों के बीच में अनुसंधान प्रयासों में संतुलन बनाये रखना विशेष रूप से जब संसाधन बहुत अधिक समिति हो, चिकित्सा अनुसंधान के प्रबंधन में विशेषकर विकसित देशों में आने वाली यह एक कठिन समस्या है। पिछले संपूर्ण कई दशकों के दौरान, चिकित्सा अनुसंधान क्षेत्र में संक्रामक रोगों और अत्याधिक जनसंख्या वृद्धि को प्रमुख प्राथमिकताओं में रखा गया है। हाल ही के वर्षों में, इन मुद्दों से निपटने के अतिरिक्त, उभरती हुई स्वास्थ्य समस्याओं यथा हदय रोग, चयापचय संबंधी विकार (मधुमेह, मेलेटिस सहित), मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं, मस्तिष्क संबंधी विकार, दृष्टिहीनता, यकृत रोग, श्रवणता, कैंसर, औषधियों का दुरुपयोग, दुर्घटनाएं, विक्लांगता आदि पर अनुसंधान को उत्तरोत्तर  (बहुत) तेज कर दिया गया है।

           पारंपरिक औषधि/ हर्बल उपचार पर अनुसंधान को एक उन्मुख रोग के दृष्टिकोण के साथ पुनजीर्वित किया गया था। जैव चिकित्सा समुदाय की बढ़ती मांगों और जरूरतों को पूरा करने के लिए चिकित्सा सूचना और संचार को मजबूत और कारगर बनाने के प्रयास किये गये हैं। परिषद नई बिमारियों और नये आयामों के प्रति पूर्ण सजग हैं, उदाहरण के रूप में वर्ष 1986 में भारत के विभिन्न राज्यों में एड्स के लिए निगरानी केन्द्रों के नेटवर्क का द्रुतगति से गठन किया गया।